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क्यों आप Decathlon जाकर जरूरत से ज्यादा खरीदारी कर लेते हैं? जानिए ‘प्लेग्राउंड स्टोर’ का राज।

यह कहानी फ्रांस के एक पार्किंग लॉट से शुरू हुई और आज आपके वार्डरोब तक पहुंच गई है। जानिए कैसे अपनी 'Vertical Integration' रणनीति और अनोखे 'प्लेग्राउंड स्टोर्स' के दम पर Decathlon ने भारत के स्पोर्ट्स मार्केट पर कब्जा कर लिया और Nike-Adidas जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया।

नीली क्रांति: कैसे Decathlon ने चुपचाप भारत के स्पोर्ट्स मार्केट पर राज किया? बिज़नेस केस स्टडी  |  20 दिसंबर 2025  |  12 मिनट की रीड


आज 2025 में आप किसी भी भारतीय घर में चले जाइए, आपको वहां “सबूत” मिल जाएगा।

दरवाजे के पास रखे ₹999 वाले दौड़ने के जूते, सोफे पर पड़ा ₹199 का छोटा बैग, या गैरेज में धूल खाता हुआ एक कैंपिंग टेंट। इन सब में एक बात समान है – ये न तो Nike के हैं और न ही Adidas के। ये उस फ्रांसीसी ब्रांड के हैं जिसने विराट कोहली को अपना ब्रांड एंबेसडर नहीं बनाया, न ही टीवी पर बड़े विज्ञापन दिए, और फिर भी, आज वह भारत का सबसे बड़ा स्पोर्ट्स रिटेलर बन गया है।

Decathlon (डेकाथलॉन) अब सिर्फ एक दुकान नहीं है; यह एक आदत बन चुका है।

वित्त वर्ष 2025 तक, डेकाथलॉन इंडिया ने ₹4,100 करोड़ से अधिक का राजस्व कमाया है और ₹197 करोड़ का भारी मुनाफा दर्ज किया है। लेकिन कैसे? आखिर कैसे एक कंपनी जो “सस्ता” सामान बेचती है, उसने “सस्ते” को “कूल” बना दिया?

1976: एक पार्किंग लॉट से शुरुआत

इस विशाल साम्राज्य को समझने के लिए हमें इसके बीज को देखना होगा। 1976 में, मिशेल लेक्लेर (Michel Leclercq) नाम के एक व्यक्ति ने फ्रांस के लिले (Lille) में एक पार्किंग लॉट में अपनी दुकान खोली।

उस समय, खेल का सामान केवल अमीरों के लिए होता था। अगर आपको टेनिस रैकेट चाहिए था, तो आपको महंगी दुकानों पर जाना पड़ता था। मिशेल का सपना अलग था: “क्या होगा अगर हम सभी खेलों का सामान एक ही छत के नीचे ले आएं और उन्हें इतनी कम कीमत पर बेचें कि कोई भी खेल सके?”

सफलता का राज: बिचौलियों का खात्मा (Vertical Integration)

कभी सोचा है कि डेकाथलॉन की टी-शर्ट ₹199 की क्यों मिलती है जबकि बड़े ब्रांड्स की ₹1,999 की?

ज्यादातर कंपनियां “मिडलमैन मॉडल” पर काम करती हैं। वे फैक्ट्री से सामान खरीदते हैं (जो अपना मुनाफा जोड़ता है), फिर डिस्ट्रीब्यूटर को देते हैं (वह भी मुनाफा जोड़ता है), और अंत में मॉल में बेचते हैं (जहां किराया बहुत महंगा होता है)।

डेकाथलॉन का जादुई लूप

  • डिज़ाइन: वे अपने उत्पाद खुद डिज़ाइन करते हैं (फ्रांस और भारत में R&D लैब्स हैं)।
  • निर्माण: वे खुद उत्पादन करते हैं। 2025 तक, भारत में बिकने वाला 70% सामान “मेड इन इंडिया” है।
  • बिक्री: वे केवल अपने बड़े गोदाम जैसे स्टोर्स में बेचते हैं, जो अक्सर शहर के बाहरी इलाकों में होते हैं जहां किराया सस्ता होता है।

ब्रांड मार्कअप, डिस्ट्रीब्यूटर और महंगे मॉल के किराए को हटाकर, वे आपको एक सैंडविच की कीमत पर जैकेट बेच पाते हैं। इसे वे “Smart Cost” कहते हैं।

स्टोर या खेल का मैदान? (Try Before You Buy)

डेकाथलॉन के स्टोर में आपको दुकान जैसी महक नहीं, बल्कि रबर और आज़ादी की महक आएगी।

बैंगलोर या नोएडा के किसी भी आउटलेट में चले जाइए, आपको बच्चे साइकिल चलाते हुए, लोग टेबल टेनिस खेलते हुए, और कोई ट्रेडमिल पर दौड़ता हुआ दिख जाएगा। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह एक मनोवैज्ञानिक रणनीति है।

डर का अंत:
जब आप किसी चीज़ को मुफ्त में इस्तेमाल कर लेते हैं, तो उसे खरीदने का डर खत्म हो जाता है। जब एक बच्चा स्टोर में 20 मिनट साइकिल चलाता है, तो माता-पिता का दिमाग उसे खरीदने के लिए तैयार हो जाता है। उनके स्टोर्स ‘शोरूम’ नहीं, ‘एक्सपीरियंस सेंटर’ हैं।

क्विक कॉमर्स का धमाका (Quick Commerce)

सालों तक डेकाथलॉन एक “वीकेंड डेस्टिनेशन” था—जहां आप परिवार के साथ छुट्टी के दिन जाते थे। लेकिन 2024-25 में उन्होंने देखा कि भारतीय उपभोक्ता बदल गया है।

Zepto और Blinkit के दौर में, हम इंतज़ार करना भूल गए हैं। हमें सब कुछ अभी चाहिए।

एक मास्टरस्ट्रोक में, डेकाथलॉन ने क्विक-कॉमर्स कंपनियों के साथ साझेदारी की। स्विमिंग गॉगल्स भूल गए? Blinkit कर लो। मैच 20 मिनट में है और शटलकॉक चाहिए? Zepto कर लो। इस “इम्पल्स स्पोर्ट्स रिटेल” ने वित्त वर्ष 2025 में उनकी कमाई में लगभग ₹500 करोड़ जोड़ दिए।

पसंद का भ्रम (The Illusion of Choice)

एक मजेदार तथ्य: जब आप डेकाथलॉन में खरीदारी करते हैं, तो आपको लगता है कि आप अलग-अलग ब्रांड चुन रहे हैं। असल में, आप ऐसा नहीं कर रहे होते।

  • Quechua (केचुआ): उनका हाइकिंग ब्रांड।
  • Kalenji (कैलेंजी): उनका रनिंग ब्रांड।
  • Domyos (डोम्यॉस): उनका जिम ब्रांड।

इन्हें “पैशन ब्रांड्स” कहा जाता है। एक ट्रैकर को “Quechua” पर भरोसा होता है क्योंकि यह नाम एक पहाड़ी जनजाति जैसा लगता है, भले ही वह डेकाथलॉन का ही माल हो। यह विशेषज्ञता का एहसास कराता है जो एक सामान्य “डेकाथलॉन जूता” कभी नहीं करा पाता।

₹8,000 करोड़ का लक्ष्य

डेकाथलॉन रुकने वाला नहीं है। उनके सीईओ, शंकर चटर्जी ने सार्वजनिक रूप से 2030 तक राजस्व को दोगुना करके ₹8,000 करोड़ करने का लक्ष्य रखा है।

कैसे? जवाब है: Tier 2 शहर।

मेट्रो शहर अब भर चुके हैं। अगली क्रांति इंदौर, कोयंबटूर और पटना से आ रही है। रांची का बच्चा भी उसी फुटबॉल बूट का सपना देखता है जो मुंबई का बच्चा देखता है। डेकाथलॉन अब छोटे शहरों में ‘कॉम्पैक्ट स्टोर्स’ खोलकर भारत की असली नब्ज पकड़ रहा है।


सीखने योग्य बात

डेकाथलॉन की सफलता हमें सिखाती है कि आपको सफल होने के लिए “कूल” बनने की जरूरत नहीं है, आपको उपयोगी बनने की जरूरत है।

उन्होंने साबित कर दिया कि ब्रांड बनाने के लिए आपको मशहूर हस्तियों की जरूरत नहीं है। आपको बस एक ₹199 के बैकपैक की जरूरत है जो कभी फटे नहीं।

Shivam
Shivam

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