Yamuna After 300 Days: सच्चाई, सिस्टम और सतही सफ़ाई के बीच फँसी एक नदी

जो नीला और साफ़ आसमान हमें दिल्ली के ऊपर दिखाई देता है, वो असल में ज़मीन से सैकड़ों मीटर ऊपर का दृश्य है। ज़मीन के क़रीब आते ही हवा में प्रदूषण की एक मोटी चादर महसूस होने लगती है। लेकिन यह कहानी हवा की नहीं है—यह कहानी है यमुना की, एक ऐसी नदी की जो दशकों से सवालों के घेरे में है।

पिछले कुछ महीनों में यमुना को लेकर दावे फिर तेज़ हुए हैं। कहा जा रहा है कि हालात सुधर रहे हैं, पानी पहले से बेहतर है, और सफ़ाई के प्रयास असर दिखा रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि यमुना गंदी है या साफ़, बल्कि सवाल यह है कि
यमुना तक गंदगी पहुँचती कैसे है?

यह सिर्फ़ पॉल्यूशन नहीं, एक सिस्टम की नाकामी है

यमुना की मौजूदा हालत किसी एक सरकार, किसी एक मुख्यमंत्री या किसी एक कार्यकाल की देन नहीं है। यह एक सिस्टमैटिक फेलियर है—ऐसी नाकामी जो दशकों में बनी, नज़रअंदाज़ की गई और धीरे-धीरे सामान्य मान ली गई।

हम अक्सर नदी के किनारे खड़े होकर राजनीति करने लगते हैं—
“इस सरकार ने कुछ नहीं किया”,
“पिछली सरकार ज़िम्मेदार थी”।

लेकिन सच्चाई यह है कि जब तक हम सिस्टम को नहीं समझेंगे, तब तक सरकारें बदलती रहेंगी और यमुना की हालत लगभग वैसी ही बनी रहेगी।

दिल्ली की जियोग्राफी: यमुना क्यों हर गंदगी झेलती है

दिल्ली की भौगोलिक बनावट एक बहुत सिंपल नियम फ़ॉलो करती है—
शहर का पश्चिमी हिस्सा ऊँचा है, और इसलिए दिल्ली का लगभग सारा पानी अंत में यमुना की ओर ही जाता है, चाहे वह बारिश का हो या शहर का रन-ऑफ।

यमुना दिल्ली के लिए सिर्फ़ एक नदी नहीं है,
वह दिल्ली का नैचुरल ड्रेनेज आउटलेट है।

पहले दिल्ली में झीलें और वॉटर बॉडीज़ थीं—जैसे नजफगढ़ झील—जो अतिरिक्त पानी को रोकती थीं। लेकिन जैसे-जैसे शहर फैला, इन प्राकृतिक सिस्टम्स को खत्म कर दिया गया और पानी को ज़बरदस्ती चैनलों में मोड़ दिया गया।

ड्रेन्स बनाम सीवर्स: यहीं से बिगड़ती है कहानी

एक आदर्श शहर में:

  • ड्रेन्स → बारिश का पानी ले जाते हैं
  • सीवर्स → घरों और उद्योगों का गंदा पानी

दोनों कभी मिक्स नहीं होते।

लेकिन दिल्ली में यह सेपरेशन लगभग खत्म हो चुका है।
अनधिकृत कॉलोनियाँ, बढ़ती आबादी और अधूरा सीवेज नेटवर्क—इन सबका नतीजा यह हुआ कि सीवेज को सबसे आसान रास्ता मिला: स्टॉर्म वाटर ड्रेन्स

और जिस दिन सीवेज ड्रेन में घुस गया, उस दिन ड्रेन, ड्रेन नहीं रह जाता।

यही वजह है कि
STP से पानी साफ़ निकलने के बावजूद यमुना गंदी दिखती है।
समस्या नदी में नहीं, नालियों में छुपी होती है।

बेसिन मैनेजमेंट: असली लड़ाई यहीं है

दिल्ली को ड्रेनेज के लिहाज़ से कई बेसिन्स में बाँटा गया है, लेकिन इनमें सबसे अहम है नजफगढ़ बेसिन

  • दिल्ली के लगभग दो-तिहाई इलाके का पानी यहीं से होकर गुजरता है
  • हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों का पानी भी इसी सिस्टम में आता है
  • नजफगढ़ ड्रेन लगभग 60 किलोमीटर लंबा है
  • इसमें 100 से ज़्यादा छोटे-बड़े ड्रेन्स आकर मिलते हैं

मतलब यमुना में जो गंदगी गिरती है, वह सिर्फ़ दिल्ली की नहीं होती—वह पूरे कैचमेंट एरिया का नतीजा होती है।

यहीं एक कड़वी सच्चाई सामने आती है:
बेसिन चुनाव, विभाग या पार्टी की सीमाएँ नहीं मानते।

STP हैं, लेकिन समस्या सिर्फ़ STP की नहीं

दिल्ली में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स हैं, बड़े-बड़े प्लांट्स हैं। उदाहरण के तौर पर, ओखला का STP एशिया के सबसे बड़े प्लांट्स में से एक है और रोज़ करोड़ों लीटर सीवेज ट्रीट करता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

STP से निकलने के बाद यही ट्रीटेड पानी:

  • अनट्रीटेड ड्रेन्स से फिर गंदा हो जाता है
  • अनधिकृत कॉलोनियों का सीवेज इसमें मिल जाता है
  • कहीं-कहीं इंडस्ट्रियल वेस्ट भी घुल जाता है

यानि एक तरफ करोड़ों रुपये खर्च कर पानी साफ़ किया जाता है,
और दूसरी तरफ वही पानी फिर से सीवेज बन जाता है

300 दिन बाद: क्या वाकई कुछ बदला है?

डेटा यह दिखाता है कि कुछ जगहों पर इम्प्रूवमेंट ज़रूर हुआ है:

  • डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन के लेवल में बढ़ोतरी दिखी
  • कुछ पॉइंट्स पर TDS पहले से कम मिला

खासकर बरसात और फ्लडिंग के बाद पानी की क्वालिटी अस्थायी रूप से बेहतर दिखती है। लेकिन जैसे ही बड़े ड्रेन्स यमुना में मिलते हैं, हालात फिर बदलने लगते हैं।

कुछ जगहों पर पानी देखने में साफ़ लग सकता है,
लेकिन बदबू, फोम और कचरे की समस्या अब भी बनी हुई है।

बेहतर, बदतर या सिर्फ़ दिखावटी सफ़ाई?

यमुना आज भी एक चौराहे पर खड़ी है।

  • कुछ सुधार हुए हैं
  • कुछ प्रयास सही दिशा में हैं
  • लेकिन सिस्टम अभी भी अधूरा है

जब तक:

  • पूरा शहर 100% सीवर कनेक्टेड नहीं होता
  • ड्रेन्स और सीवर्स अलग नहीं होते
  • और लोग खुद नदी में कचरा फेंकना बंद नहीं करते

तब तक यमुना की सफ़ाई स्थायी नहीं हो सकती

यमुना को बचाने के लिए सिर्फ़ दावे नहीं,
सिस्टम-लेवल बदलाव चाहिए।

Shivam
Shivam

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